गणेश चतुर्थी — गजानन के दस पावन दिन
गणेश चतुर्थी से सप्ताह पहले महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के मूर्तिकारों के कार्यशालाओं में गीली मिट्टी की महक और औजारों की खनखनाहट भर जाती है। हर आकार की गणेश मूर्तियाँ आकार लेती हैं — घर की छोटी वेदी के लिए अँगूठे भर की मूर्ति से लेकर मुंबई के पंडाल के लिए दस फुट ऊँची भव्य प्रतिमा तक।
भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को — अगस्त या सितंबर के अंत में — मूर्तियाँ घर लाई जाती हैं। परिवार एकत्र होता है। पुजारी प्राण प्रतिष्ठा मंत्रों से मिट्टी में प्राण फूँकते हैं। और दस दिनों तक भगवान गणेश — विघ्नहर्ता, नव आरंभ के स्वामी, गजमस्तक भगवान — घर में विराजते हैं।
घर में मोदकों की मीठी सुगंध छाई रहती है। बच्चे फूलों और आभूषणों से सजावट करते हैं। पूजा की घंटी सुबह-शाम बजती है। और दसवें दिन आता है वह क्षण जो उत्सव का चरमोत्कर्ष भी है और विदाई भी — विसर्जन।
गणेश जन्म की कथाएं
माँ पार्वती का पुत्र
सबसे प्रिय कथा पार्वती माँ की है। शिव की अनुपस्थिति में पार्वती ने एकांत में स्नान की इच्छा से अपने उबटन से एक बालक बनाया, उसमें प्राण फूँके और द्वारपाल बनाया। जब शिव लौटे और बालक ने उन्हें रोका, तो क्रोधवश शिव ने उसका मस्तक काट दिया।
पार्वती का विलाप देख शिव ने अपने गणों को उत्तर दिशा की ओर मुँह किए जीव का मस्तक लाने भेजा। वे हाथी का मस्तक लाए। शिव ने वह मस्तक बालक के धड़ पर लगाया, प्राण लौटाए और घोषणा की — यह उनका पुत्र है, गणों का अधिपति, जो हर कार्य से पूर्व पूजा का अधिकारी होगा। गणेश — गण + ईश, गणों के स्वामी।
संसार की परिक्रमा
एक और प्रिय कथा है। नारद मुनि एक दिव्य फल लाए और कहा — जो पहले ब्रह्मांड की परिक्रमा करे, फल उसका। कार्तिकेय मोर पर सवार होकर उड़ चले। गणेश ने बस अपने माता-पिता शिव-पार्वती के चारों ओर एक बार चक्कर लगाया और बैठ गए।
“मेरे माता-पिता ही मेरा ब्रह्मांड हैं,” गणेश ने कहा।
फल गणेश को मिला।
लोकमान्य तिलक और सार्वजनिक उत्सव
1893 से पूर्व गणेश चतुर्थी एक पारिवारिक उत्सव था। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने इसे बदल दिया। ब्रिटिश शासन में जब बड़ी सभाओं पर प्रतिबंध था, तिलक ने इस पर्व को जातिगत भेदभाव मिटाकर जन-जागरण का माध्यम बनाया। पुणे में 1893 में पहला सार्वजनिक गणेशोत्सव हुआ। यह परंपरा आज भी जीवंत है — मुंबई के लालबागचा राजा और दगडूशेठ हलवाई गणेश जैसे पंडालों में लाखों भक्त दर्शन करते हैं।
विसर्जन — भव्य विदाई
दसवें दिन — अनंत चतुर्दशी — विदाई का समय आता है।
गणेश मूर्ति को नृत्य-गान और रंगों के साथ जुलूस में समुद्र, नदी या तालाब तक ले जाया जाता है। मूर्ति धीरे-धीरे जल में विसर्जित होती है और जनसमूह से उठती आवाज:
गणपति बप्पा मोरया! पुढच्या वर्षी लवकर या! गणपति बप्पा मोरया! अगले वर्ष जल्दी आना!
यह विदाई दुखद नहीं — यह एक चक्र की पूर्णता है। गणेश आए, आशीर्वाद दिया, भक्ति स्वीकार की और निर्गुण में लौट गए। अगले वर्ष फिर आएंगे।
ॐ गं गणपतये नमः।
विधि और अनुष्ठान
- घरों और सार्वजनिक पंडालों में मिट्टी की गणेश मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा
- प्रतिदिन 21 मोदक (मीठी पकौड़ी) — गणेश जी का प्रिय भोग
- अथर्वशीर्ष (गणपति उपनिषद) का पाठ
- जय गणेश देवा और सुखकर्ता दुखहर्ता का गायन
- विसर्जन — डेढ़, पाँच, सात या दस दिन पर भव्य शोभायात्रा और मूर्ति का विसर्जन
- सार्वजनिक पंडालों में सांस्कृतिक कार्यक्रम, भजन और सामुदायिक मिलन
- दूर्वा घास, लाल फूल और नारियल का अर्पण
उपवास
इस त्योहार पर आमतौर पर उपवास नहीं रखा जाता।
कहाँ मनाया जाता है
Frequently Asked Questions
- What is गणेश चतुर्थी?
- दस दिवसीय महापर्व जो विघ्नहर्ता और नव आरंभ के स्वामी भगवान गणेश के जन्मोत्सव का उत्सव मनाता है, जो मिट्टी की मूर्तियों के भव्य विसर्जन के साथ समाप्त होता है।
- When is गणेश चतुर्थी celebrated?
- गणेश चतुर्थी is celebrated on 2026-08-22 and is observed in Pan-India, Particularly grand in Maharashtra, Andhra Pradesh, Karnataka, Tamil Nadu.
- What rituals are performed during गणेश चतुर्थी?
- Key rituals include: घरों और सार्वजनिक पंडालों में मिट्टी की गणेश मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा, प्रतिदिन 21 मोदक (मीठी पकौड़ी) — गणेश जी का प्रिय भोग, अथर्वशीर्ष (गणपति उपनिषद) का पाठ, जय गणेश देवा और सुखकर्ता दुखहर्ता का गायन, विसर्जन — डेढ़, पाँच, सात या दस दिन पर भव्य शोभायात्रा और मूर्ति का विसर्जन, सार्वजनिक पंडालों में सांस्कृतिक कार्यक्रम, भजन और सामुदायिक मिलन, दूर्वा घास, लाल फूल और नारियल का अर्पण.
- Is fasting observed during गणेश चतुर्थी?
- Fasting is not typically required during गणेश चतुर्थी, though some devotees may choose to fast as personal practice.